
कामनवेल्थ गेम के दौरान दिल्ली ऐसी रही जैसे रेत पर दिखने वाली मृगमरीचिका। जिस प्रकार मृगमरीचिका में जब हम रेत पर दूर तक नजर दौडाते हैं तो कभी ऐसा एहसास होता है कि हमारे आखों के सामने जल सागर हो लेकिन जब हम आगे बढते हैं तो यह एक स्वप्न के सामान टूट जाता है। ठीक इसी प्रकार दिल्ली को भी हमने इसी नजर में देखा। खेल महाकुम्भ के बीतते ही सबकुछ पहले जैसा हो गया अब फिर सिग्नल पर गाड़ियाँ रूकते ही भिखारी दिखने लगे, सडकों के किनारे लगे पौधे सूखने लगे ,ट्रैफिक वाले अपनी रूआब दिखाने लगे, पुलिस भी हफ़्ता लेकर ठेले लगवाने लगी और ब्लू लाइन भी आ पड़ी अपनी रफ़्तार दिखाने , दिल्ली मेट्रो वाले तकनीकी खामियों से यात्रियों को रूलाने लगे और इनमें सबसे खास बात तो यह है कि अब गरीबों की कुटिया यानी झुग्गियां भी सड़कों से दिखने लगीं।
दिल्ली सरकार ने कामनवेल्थ के लिए दिल्ली की कमियों दूर करने के बजाय इसे पर्दे की आड़ में छिपाने की कोशिश की और इसमें काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन इस पर्दे के पीछे न जाने कितने गरीब लोग महिनों तक रोटी कमाने के संघर्ष में जूझते रहे । सरकार ने इन समस्याओं का स्थायी हल निकालने के बजाये इस टालने का जो काम किया है वह समस्या बदस्तूर यूँ ही जारी रहेगा। जहाँ राजधानी में कॉमनवेल्थ को उच्च तबका त्योहारों की तरह मनाने में लगा था वहीँ गरीब वर्ग मनहूसियत की इस घड़ी को कोश रहा था। सरकार ने दिल्ली के विभिन्न इलाकों में स्थित हजारों झुग्गियों का पुर्नविस्थापन करने के बजाय शेरा के चित्र के बने बड़े बड़े होर्डिंग से इन्हें छिपाकर सुन्दर दिल्ली बना रखी थी। उन्ही झुग्गियों में रहने वालों का एक बड़ा तबका रेहड़ी लगाकर अपना जीवकोपार्जन करता रहा है लेकिन खेल होने के दो माह पूर्व ही सरकार के निर्देश से पुलिस ने इनके सड़कों पर रेहड़ी लगाने पर रोक लगा दी। इन गरीबों को खेल खत्म होने के बाद फिर से पुलिस की मेहरबानी से सड़कों पर रेहड़ी लगाने का आश्वासन दिया गया था । इन गरीबों को खेल के बाद फिर से जीविका चलाने की स्वीकृति सरकार द्वारा मानवता के आधार पर नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति के चलते देनी पड़ी। सड़कों पर दिखने वाले भिखारियों का भी हाल इससे इतर नहीं रहा,सरकार ने भिखारियों को हटाने में सारी तरकीब लगा दी लेकिन फिर भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका तो बाद में सरकार ने कामनवेल्थ के दौरान इन्हें दिल्ली से दूर एनसीआर क्षेत्रों में टेन्टों में रखकर इस खाज पर पर्दा डालने का प्रयास किया । अगर सरकार इनके प्रति सकरात्मक सोच रखती और बेगर्स होम बनाकर इन्हें समाजसेवी संस्थाओं से जोड़कर रोजगार का सृजन कराती तो इनकी स्थिति कुछ और ही होती। दिल्ली में विदेशी पर्यटकों को हरी भरी दिल्ली दिखाने के लिए सड़कों के किनारे रातो रात गमले सहित पौधे बिछा दिये गये लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस हरियाली को किसी ने नजर लगा दी। गेम के दौरान फर्जी चलान न कर पाने वाले ट्रैफिक पुलिस अपनी सारी खीज गेम के बाद निकालने में जुट गयी है। दिल्ली के परिवहन की जान व दिल्लीवासियों की जान लेने वाली ब्लू लाइन बसें भी गेम के बाद अपनी रफ़्तार का कहर दिखाने के लिए तैयार नजर आ रही हैं। जबकि कामनवेल्थ गेम में शत प्रतिशत फ्रीक्वेंसी बनाये रखने वाली दिल्ली मेट्रो अपनी तकनीकी खामियों के चलते यात्रियों को रूलाने में फिर से जुट गयी है। दिल्लीवासियों का कामनवेल्थ के दौरान बेहतर आचरण की तारीफ करते सरकार थक नहीं रही और प्रश्न यह है कि दिल्ली वाले ऐसा आचरण हमेशा ऐसे क्योंनहीं रखते। लेकिन बेहतर आचरण की अपेक्षा कर रही सरकार शायद यह कहावत भूल गयी है कि जैसा बीज बोयेगे वैसा ही फल काटेंगे।
अभय कुमार पाण्डेय
well done ! good wishes.
जवाब देंहटाएं