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सोमवार, 8 अगस्त 2011

ऐसा देश है मेराः जहाँ है विकास की विविधता



सही कहा गया है कि भारत जैसी विविधता किसी और देश में नहीं मिल सकती मौसम से लेकर भाषा तक। यहाँ तक की मील -मील पर पानी बदलता है लेकिन देश विकास में भी ऐसी विविधता मिलना क्या दर्शाती है? विश्व में भारत को आधुनिक टोक्यो दिखाने के मकसद से राजधानी के कनाट प्लेस एरिया में फुटफाथ पर हजार करोड़ रूपये के लाल संगमरमर पत्थर लगाये जाते है जबकि विकास का विविधता का दूसरा पहलू यह है कि विकास की पटकथा से इतर सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में किसान फसल चैपट हो जाने के बाद कर्ज मे डूबकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है। अब आप ही बताईए इतनी विविधता कहाँ मिलेगी किसी देश में।

हाल में कैग की आयी ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बीते साल खेल महाकुम्भ की तैयारियों के लिए कनाट प्लेस को स्वर्ग बनाये जाने की योजना वर्ष 2005 में बनाई गई थी इसके लिए 76 करोड़ रूपये का अनुमानित बजट बनाया गया था और 2007 आते आते कनाट प्लेस को चमकाने का बजट 9 गुना बढकर 671 करोड़ हो गया। राजधानी का दिल कहे जाने वाले इस जगह के फुटफाथ पर लाल संगमरमरी पत्थर लगाये गये। सीसे सरीखा चमकने वाले इन पत्थरों पर विदेशियों को भारत की छवि दिखाई गईं कि भारत कितने विविधता वाला देश है जहां राजधानी में फुटफाथ पर महंगे पत्थर लगते है वहीं ग्रामिण क्षेत्रो की सड़कों पर इटें तक नहीं बिछाये जाते।

इसे देश की विडम्बना ही कहेंगे कि किसानों की एक बार कर्जमाफी करने पर सरकार कई चुनाव तक अपना ऐहसान इन अन्नदाताओं पर जताती है लेकिन इन्ही किसानो की खून व पसीने से निकले पैसे को सरकार राजधानी को जन्नत बनाने के लिए फुटपाथ पर रंगीन संगमरमर पत्थर लगा दिये जाते है लेकिन तब कोई किसान व आम आदमी सरकार पर कोई एहसान नहीं दिखाता। दिल्ली में आयोजित हो चुके इन खेलों के लिए उस वक्त कई सौ करोड़ खर्च कर खिलाडियों के लिए सफदरजंग मे इंजरी हॉस्पिटल निर्मित किया गया यह बात अलग है कि करोड़ो की मशीने व चिकित्सा उपकरण के सील भी अभी तक नहीं खुले होंगे जबकि दूसरे परिपेक्ष्य मे सरकार द्वारा विविधता का इतना सही संतुलन है कि पूर्वांचल में प्रत्येक वर्ष हजारों बच्चे इन्सेफ्लाईटिस बीमारी की वजह से अपनी जान गंवा देते है और ऐसे क्षेत्र में पिछले दो दशको में सरकार के पास इतना बजट नहीं जुट पाया कि वह इस बीमारी से दो चार होने वाले ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए एक बेहतर अस्पताल खड़ा कर सके। इसी कामनवेल्थ के लिए राजधानी को दुधिया रौशनी से नहलाने के लिए विदेशों से स्ट्रीट लाइट मंगाइ गई जिसके एक लाइट की कीमत 35 हजार रूपये थी और पूर राजधानी को जगमगाने मे सरकार ने करोडो रूपये पानी की तरह बहाये, यह वही देश है जहां कई गांवो स्ट्रीट लाइट तो छोड़िये एक बल्ब की रोशनी तक नहीं पहुची हैं । विकास किसे पसंन्द नहीं लेकिन अगर इस विकास की शर्तों का खामियाजा सिर्फ आम आदमी व किसान भुगतते है तो यह विकास शोषण का रूप ले लेता है सरकार कब समझेगी कि देश की असली छवि कनाट प्लेस पर जन्नत बनाने से नहीं ग्रामीण क्षेत्रो में विकास की गंगा बहाने से बनेगी । विविधता मौसम में अच्छा लग सकता है भाषा मे लग सकता है लेकिन समाजिक परिवेश में विविधता एक खाई बनाती है और यह दूरिया इंडिया व भारत में जैसी विविधता भी पैदा करती है ।


अभय कुमार पाण्डेय

खेलों की ब्रांडिंग पर 10 करोड़ रुपये हुए थे स्वाहा

अभय वुमार पाण्डेय नईं दिल्ली। राजधानी में बीते वर्ष हुए कॉमनवेल्थ खेलों में शेरा को विशेष पहचान दिलाने के मकसद से ब्रांडिंग पर 10 करोड़ रुपये लगाया गया और इसके लिए विशेष कम्पनी को यह जिम्मेदारी सौंपी गईं। ग्राॉफिक्स व बैनर से होने वाले इस ब्रांडिंग के जरिये खेल समाचार व माव्रेटिंग सेवा होनी थी लेकिन इस जीएनएस सिस्टम ने काम करना बन्द किया और आयोजन समिति को वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी।

वैग रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 10 करोड़ रुपये की भारी राशि खर्च कर जीएनएस सेवा को आउटसोर्स करने का पैसला किया गया जबकि मेलबोर्न सीडब्ल्यूडी 2006 खेलों में इससे बहुत कम दामों पर यह व्यवस्था आंतरिक रत्रोतों के जरिये की गईं थी।

वैग ने कॉमनवेल्थ खेलों में जीएनएस ब्रांडिंग की निविदा को भी कटघरे में खड़ा किया है। इस मूल निविदा को रद्द कर एक विशेष कम्पनी को लाभ पहुंचाने के मकसद से उसे इस बीड में अकेले शामिल किया गया।

इस पूरे ब्रांडिंग में अनियमितता के बाद 5 से 8 अक्तूबर तक किसी को भी खेल सूचनाएं नहीं मिल पाईं।

आयोजन समिति ने बाद में इस सेवा को जारी रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्भर होना पड़ा।

खेलों के प्राचार के लिए बैनर लगाने में भी वैग ने धांधली की बात कही है। पहले बैनर लगाने का काम समूहों के आधार पर लगाने का पैसला किया गया। बाद में वक्त की कमी दिखाकर आकस्मिक निविदा प्राव््िराया की गईं जिसमें अयोग्य कम्पनियों को बोली लगाने की छूट दी गईं जबकि कईं कम्पनियां जो इस निविदा के लिए योग्य थीं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। इस निविदा में अलग-अलग ठेके विभिन्न दरों में देने का भी मामला प्राकाश में आया है।

वुल मिलाकर देखा जाए तो यह साफ होता है कि खेलों के ब्रांडिंग के नाम पर 9 करोड़ रुपये स्वाहा हो गए जबकि ऐसे सेवाओं में आउटसोर्स रत्रोतों का प्रायोग क्यों किया गया, यह भी सवालों के घेरे में

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

कॉमनवेल्थ की योजना बनाने में ही बर्बाद किया पांच साल

देश के सम्मान से जुड़े कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन पर सरकार कितनी सकिय थी इसका खुलासा कैग की ताजा रिपोर्ट से हो जाता है जिसमें बताया गया है कि कॉमनवेल्थ खेलों की योजना का प्रारूप बनाने में ही सरकार ने पांच वर्ष का समय जाया किया।

नवंबर 2003 में दिल्ली को खेल महाकुम्भ की जिम्मेदारी मिली लेकिन अगले तीन सालों में सरकार इस खेल महाकुम्भ के आयोजन पर एक नक्शा भी तैयार नहीं कर पाई। इस दौरान सरकार आयोजन समिति के गठन में जुटी रही। जिसे वर्ष 2003 में कॉमनवेल्थ की दावेदारी के समय सर्कार के अधीन काम करने वाली संस्था दिखाई गयी लेकिन इन शर्तों की अनदेखी करते हुए सरकार ने इसे स्वतंत्र संस्थान के रूप में वर्ष 2005 में आयोजन समिति का पंजीकरण कराया।

यह देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जिस संस्था को इतने बड़े खेल आयोजन का मोर्चा संभालना था उसका पंजीकरण खेल आयोजन से मात्र पांच वर्ष पूर्व कराया गया। कैग ने सरकार की इस देरी पर भी सवाल उठाते हुए कहा है कि जितने दिनों में आयोजन समिति के पंजीकरण में सरकार मसगूल रही उतने में कॉमनवेल्थ की कार्य योजना तैयार हो जाती। ब्रिटेन में होने वाले ओलम्पिक में पांच वर्ष पहले स्टेडियम तैयार

हो जाते हैं और कैग रिपोर्ट के अनुसार भारत में हुए कॉमनवेल्थ के पांच वर्ष पूर्व कार्य योजना तैयार करने के लिए सलाहकार तक नियुक्त नहीं हो पाए थे। वर्ष 2006 में आयोजन समिति की नींद खुली और ईकेएस को कॉमनवेल्थ में होने वाली परियोजनाओं के निर्माण की योजना तैयार करने के लिए सलाहकार नियुक्त किया गया।

अभी यह तो ट्रेलर था। आयोजन समिति ने इसके बाद विभिन्न खेल स्थलों के निर्माण के डिजाइनों में कई परिवर्तन कराए जिसमें न सिर्फ पैसे अतिरिक्त खर्च हुए बल्कि देश की इज्जत भी ताक पर लग गईं।

कैग रिपोर्ट के बाद कॉमनवेल्थ खेलों की योजना तैयार करने में आए खुलासे से साफ होता है कि क्यों इस खेल को कामन मैन की जेब पर डाका माना गया। कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन को लेकर खूब होहल्ला मचा लेकिन कैग रिपोर्ट से अब यह साफ होता है कि खेल प्रोजेक्टों में देरी व अतिरिक्त पैसे के खर्च का जिम्मेदार सिर्फ सरकार की गलत नीतियां हैं।

अभय कुमार पाण्डेय