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सोमवार, 30 अगस्त 2010

यूपीएससी के परिणामों पर छात्रों का प्रदर्शन
30 अगस्त , 2010

नई दिल्ली। दिल्ली में छात्रों के एक समूह ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के परिणामों को लेकर रविवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। छात्रों ने परिणामों में धांधली एवं आयोग पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए हाथों में मोमबत्तियां लेकर प्रदर्शन किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के शोधछात्र अनुराग त्रिपाठी ने बताया, ""कम अंक पाने वाले कई छात्रों के नाम सूची में डाल दिए गए हैं, जबकि ज्यादा अंक पाने वालों के नाम सूची से बाहर रखे गए हैं।""उल्लेखनीय है कि यूपीएससी ने प्रवेश परीक्षा के परिणामों की घोषणा पिछले सप्ताह की गई थी। यूपीएससी देश की उच्चातर प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश के लिए त्रि-स्तरीय वार्षिक परीक्षाओं का आयोजन करता है। छात्र परीक्षा के संचालन एवं अंक तालिका के प्रकाशन की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। जेएनयू के एक अन्य छात्र कपिल ने कहा, ""मैंने भूगोल में 84 और सामान्य अध्ययन में 56 अंक पाए हैं, लेकिन सूची में मेरा नाम नहीं था। मैं कम अंक पाने वाले उन छात्रों को जानता हूं जिनके नाम सूची में शामिल हैं।"" छात्र पहले भी अंक एवं अंकों की तालिका दिखाने की मांग कर चुके हैं। आयोग अंक दिखाने संबंधी सूचना के अधिकार के तहत दिए गए आवेदनों को भी निरस्त कर चुका है। प्रदर्शकारी छात्र हाथों में तख्तियां और बैनर भी लिए हुए थे तथा यूपीएससी के खिलाफ नारे लगा रहे थे।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

कॉमनवेल्थ में भिखारी तो दिखेंगे ही
प्रकाशित: 18 जुलाई 2010

अभय कुमार पाण्डेय
नई दिल्ली। आगामी कॉमनवेल्थ खेलों में दिल्ली की सड़कों से भिखारियों को हटाने की मुहिम या यूं कहें कि इस समस्या को परदे की आड़ में करने छिपाने की कोशिश में दिल्ली सरकार को झटका लगा है क्योंकि सरकार द्वारा भिखारियों के मूल राज्यों के सरकारों को भेजे गए पत्र का जवाब उल्टा पड़ता दिख रहा है। गौरतलब है कि सरकार ने देश के कई राज्यों को पत्र लिखकर कहा था कि उनके राज्यवासी दिल्ली के सड़कों पर भिक्षावृत्ति कर रहे हैं चूंकि यह दिल्ली में अपराध है और कॉमनवेल्थ खेल से पूर्व उनके पूर्वाभास की योजना के तहत वे अपने यहां उन्हें बसाने की योजना पर अपना पक्ष बताए। इस पत्र के जवाब में विभिन्न राज्यों ने भिखारियों के लिए राहत व अपने लिए सिरदर्द कम करने का प्रयास किया है। इस समय दिल्ली के सड़कों पर भीख मांगने वालों में विभिन्न राज्यों से है जिसमें पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, आदि प्रमुख हैं। वरिष्ठ अधिकारी के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्यों से मिले जवाब के अनुसार राज्यों ने इस मुद्दे को बाकायदा संविधान की व्याख्या करते हुए कहा है कि वे भिखारी भारतीय नागरिक हैं और भारतीय संविधान के अनुसार वे देश के किसी भी कोने में रहने के लिए स्वतंत्र है। अभी इन राज्यों ने तो कम से कम इन भिखारियों को अपने राज्य की पृष्ठभूमि का माना वहीं कई राज्य ऐसे रहे जिन्होंने इससे इंकार कर दिया कि दिल्ली में भिक्षावृत्ति कर रहे लोग उनके राज्य के निवासी हैं। इन राज्यों से मिले इन जवाब पर अब सरकार भी स्पष्ट रूप से कुछ कहने से बच रही है। राजधानी में प्रत्येक वर्ष लगभग ढाई से तीन हजार भिखारियों को भिक्षावृत्ति के अपराध में पकड़ा जाता है।
अब इस स्थिति में सरकार करे भी तो क्या करे न ही यह हड्डी उगलते बन रही है और न निगलते।
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ाढा@मनवेल्थ अब जब कुछ दिन बाकी है और भिक्षु मुक्त जोन का सपना टूट रहा है। ऐसे में समाज कल्याण विभाग इस खाज को छिपाने के लिए कैसे परदे का इस्तेमाल करेगी यह देखने वाली बात होगी।

दिल्ली ही नहीं भारत की शान है मेट्रो
प्रकाशित: 25 जुलाई 2010

अभय कुमार पण्डेय
नई दिल्ली। दिल्ली मेट्रो का सफरनामा कीर्तिमानों का पूरक हो गया है। शायद ही विश्व की कोई मेट्रो सेवा हो जो इतने कम समय में सभी सुरक्षा व सुविधा मानकों को पूरा करते हुए यात्रियों की पहली पसंद बना है। दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरशन ने पिछले एक के अन्तराल में 3 (तीन) अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर विश्व भर में अपनी अलग छाप बना ली है।
इस वर्ष 23 मार्च को लन्दन विक्टोरिया पार्प टेरापिड कारपोरेशन द्वारा विश्व मेट्रो सेवा पुरस्कार कार्यकम में 70 देशों के मेट्रो पणालियों को डीएमआरसी ने पछाड़ कर बेस्ट इम्पुव्ड यानी उत्कृष्ट मेट्रो सेवा का पुरस्कार अपने नाम किया। यह वह पल था जब विक्टोरिया पार्प में डीएमआरसी न सिर्प अपनी महारत का पुरस्कार पाया बल्कि इस पुरस्कार ने विश्व पटल पर भारत का पहचान का नया रूप दे दिया।
दिल्ली मेट्रो का सुखद परिवहन व्यवस्था पणाली पर भारत के आम आदमी को गर्व करने वाला एहसास कराता है। दिल्ली मेट्रो को चुनौतियों में काम करना उनके हुनर को और निखार कर सामने लाता है।
कामनवेल्थ पोजेक्ट के तहत बनने वाले रूट का लक्ष्य इन्हीं चुनौतियों में से एक था लेकिन डीएमआरसी ने अपने बेहतरीन कार्य पणाली की बदौत समय अवधि के भीतर ही रूटों को शुरू कर सभी आलोचकों का जवाब दे दिया।
दिल्ली मेट्रो के पोजेक्ट समय अवधि के अन्तराल में पूरा करने में डीएमआरसी के सिविल इंजिनियरिंग अहम् योगदान दिया। मेट्रो के सिविल इंजिनियरिंग ने अपने कार्यपणाली से विश्व भर के देशों का ध्यान अपनी ओर खींचा और इसी का नतीजा रहा है कि एशियन सिविल इंजिनियरिंग को आरडिनेटिंग कांउसील ने वर्ष 2012 में सर्वश्रेष्ठ इंजिनियरिंग पुरस्कार से डीएमआरसी को नवाजा गया।
दिल्ली मेट्रो ने जहां अपना पोजेक्ट समय अवधि पूरता करता आ रहा है वहीं बेहतरीन परिवहन व्यवस्था के इस संचालन के साथ-साथ यात्रियों को जागरूक करने व यात्रियों ाकेयात्रा के दौरान बेहतर आचरणकर्ता बनाने के लिए वालंटियर मुहिम की शुरूआत की जिसमें मेट्रो में आम यात्रियों को इस कार्यकम से जोड़ा गया।
दिल्ली मेट्रो के सिटिजन फोरम वालंटियर कार्यकम को विश्व भर में सराहा गया। साथ ही अभी हाल में भी ’इंटरनेशनल बिजनेस अवार्ड 2010“ स्टीव अवार्ड्स से दिल्ली मेट्रो को उनके जनसम्पर्प व सामुदायिक में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित किया गया। दिल्ली मेट्रो दिल्ली की ही नहीं देश की शान बन गई है बस इंतजार है तो ऐसा सुगम परिवहन भारत के सभी पमुख शहरों में भी दौड़े और यात्रियों की लाइफ लाइन बन जाए।

प्रकाशित: 26 जुलाई 2010

अभय कुमार पाण्डेय
नई दिल्ली। जहां एक हिट सिनेमा में चारों तरफ पर्दे के आगे दिखने वाले नायक की वाहवाही चल पड़ती है और उस नायक के पीछे उसके खतरनाक सीन में जान डालने वाला स्टंटमैन पर्दे के पीछे ही रह जाता है। ठीक उसी प्रकार दिल्ली की चमक बन चुकी दिल्ली मेट्रो के 20 हजार श्रमिक जो आज भी खतरों से जूझते हुए सिर्प स्टंटमैन बनकर रह गए वह भी पर्दे के पीछे।
दिल्ली मेट्रो की नींव ऐतिहासिक गाथाओं से कम नहीं है क्योंकि इतिहास में भी जो धरोहर बने वह भी श्रमिकों के रक्तरंजित रहे वही दिल्ली मेट्रो में अभी तक लगभग 100 श्रमिकों का जान गंवाना इसे भी इतिहास के धरोहरों में शामिल करता नजर आ रहा है।
दिल्ली मेट्रो आधुनिक तकनीक व इंजीनियरिंग का डंका पूरे विश्व में पीट रही है लेकिन दिल्ली मेट्रो के पास एक ऐसा हथियार रहा जिसका जिक्र करना सभी भूल गए वह है मैन पावर यानि मानव शक्ति मतलब दिल्ली में मेट्रो ने पिछले एक दशक से जिन मुकामों को हुआ है उनमें आखिरकार इन मैन पावर का जिक्र क्यों छिपकर रह गया।
पूरी दिल्ली मेट्रो इन श्रमिकों के खून पसीने पर खड़ा किया गया लेकिन इसके बदले में यह श्रमिक डीएमआरसी व मेट्रो प्रोजेक्ट का कार्य कर रहे कांटेक्ट कंपनियों के बीच अपने वजूद को ढूंढते नजर आ रही है। अभी तक जब भी मेट्रो कामयाबी का श्रेय लेने का वक्त आया तो हर किसी ने आगे बढ़कर इसे गले लगाया लेकिन जब भी इस कामयाबी पाने की त्वरित चाह में कुछ अनहोनी हुई तो हर कोई पल्ला झाड़ता नजर आया। मेट्रो प्रोजेक्टों पर हुए हादसे इस बात का गवाह रही क्योंकि ऐसे वक्त में फिर तथ्य डीएमआरसी व निर्माण एजेंसी कंपनियों के बीच श्रमिक पिसते रहे।
कहने को तो हमारे देश में श्रम कानून है जो श्रमिकों के हितों को ध्यान देने के लिए बनाई गई है लेकिन गर्मी के तेज तपिश भरी धूप में या दिसम्बर व जनवरी माह के कड़कड़ाती ठंड की परवाह किए बगैर 12-12 घंटे तक काम करने वाले श्रमिकों की न ही स्पष्ट न्यूनतम मजदूरी व साप्ताहिक अवकाश, पीपीएफ यूनियन बनाने जैसे मौलिक अधिकारों से वंचित रहे हैं। ऐसा न ही की इसमें सारा दोष संस्था पर मढ़ना सही होगा क्योंकि संस्था ने तो बड़े-बड़े बोर्डों पर न्यूनतम मजदूरी लिखवा रखी है।
खैर अब इन पर्दे के पीछे के नायक की वर्तमान जीवकोपार्जन की स्थिति पर बात करे तो कांटेक्ट कंपनियों के द्वारा उप ठेकेदार रखे जाते हैं। यह उप ठेकेदार इन श्रमिकों विभिन्न प्रदेशों से काम दिलाने के नाम पर लाते हैं। यह उप ठेकेदार या जाबर इन्हें मेट्रो में काम पर लगाता है और बड़ी संख्या में आए श्रमिकों को 10 से 15 की संख्या में एक-एक कमरे में ठहरा देता है।
इन श्रमिकों के लिए मेट्रो प्रोजेक्टों में काम करना ही इनकी दुनिया बन जाती है, पैसे की कमी व जीवन में बनी अस्थिरता का भय इन्हें सताता रहता है लेकिन मुकद्दर का फैसला समझ कर यह फिर सो जाते हैं और फिर उठने पर फिर मिशन मेट्रो।
पर्दे के पीछे के नायकों को आज भी अपने वजूद की तलाश जारी है। शायद कभी भविष्य में इन्हें भी पर्दे के पीछे नहीं पर्दे के सामने रखा जाए।